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| Afghanistan map highlighting Kunduz |
सजायाफ्ता अफगानी पत्रकार सईद परवेज़ कमबख्श ने काबुल में एक अपील अदालत से 18 मई को कहा कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप झूठ और गैरकानूनी, दोनों हैं । कमबख्श को जनवरी महीने में बाल्ख प्रांत की एक अदालत ने अल्लाह की निंदा के आरोप में मौत की सजा सुनाई थी । इस सजा के लिए कुछ ही मिनटों तक कार्यवाही चली थी और उस पत्रकार को अपने बचाव में कोई वकील नहीं रखने दिया गया था । आरोपी के भाई याकूब इब्राहिमी ने कहा कि इस सजा के खिलाफ अपील की छह महीने में पहली बार सुनवाई हई, जिससे कमबख्श को उन आरोपों का सार्वजनिक रूप से खंडन करने के लिए एक मौका मिला ।
24-वर्षीय पत्रकार की तरफ से सुनवाई में कोई कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं था । इसलिए 25 मई तक सुनवाई को स्थगित कर दिया गया ताकि वह किसी वकील से सम्पर्क कर सके और अपना लिखित बचाव कर सके । बाल्ख यूनिवर्सिटी के छात्र एवं जहान-ए नव अखबार के रिपोर्टर श्री कमबख्श को अक्टूबर महीने में इंटरनेट से मुस्लिम समुदाय में महिलाओं से संबंधित एक लेख को डाउनलोड करने के बाद गिरफ्तार कर लिया गया । इंस्टीट्यूट ऑफ वॉर एंड पीस रिपोर्टिंग के जां मैककेन्जी ने कहा कि कमबख्श के खिलाफ जितने आरोप लगाए गए हैं, वे सभी मनगढ़ंत हैं । इन आरोपों को मजार में अधिकारियों ने गढ़ा ताकि परवेज़ के भाई याकूब पर दबाव डाला जा सके । याकूब ने बाल्ख एवं अन्य उत्तरी प्रांतों में कुछ ताकतवर कमांडरों द्वारा ढाए गए जुल्म की दास्तां करने वाले कुछ बेहद तीखे लेख लिखे हैं ।
मीडिया की आजादी की पैरोकार एक स्वतंत्र निगरानी संस्था दी कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के एशिया प्रोग्राम को-ओर्डीनेटर बॉब डीज़ ने कहा- हम रविवार को हुई अपील सुनवाई का स्वागत करते हैं । परवेज़ कमबख्श के लिए एक निष्पक्ष एवं पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया की दिशा में यह पहला कदम है ।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के उप प्रवक्ता टॉम केसी ने कहा कि अमेरिका श्री कमबख्श को दी गई सजा को लेकर चिंतित है । उन्होंने कहा कि यह सजा एक रिपोर्टर को मूल रूप से अपना पेशा करने के जुर्म में दी गई है ।
श्री कमबख्श अकेले अफगान पत्रकार नहीं हैं, जिन्हें अपना काम करने की सजा भुगतनी पड़ी है । अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने मानवाधिकार पर अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2007 में अफगान इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट एसोसियेशन एंड सेंटर फॉर इंटरनेशनल जर्नलिज्म की रिपोर्ट के अनुसार, कबीलाई नेताओं, लड़ाकू सरदारों और सरकारी अधिकारियों की धौंस-पट्टी और अनावश्यक प्रभाव की वजह से ऐसे 43 मामले दर्ज किये गए हैं । तालिबानी उग्रवादी अभी भी पत्रकारों को हिंसा की धमकी दे रहे हैं ।
लोकतंत्र की ताकत की एक महत्वपूर्ण परख यह है कि विवादित विचारों और लिखी गई खबरों को झेलने की उसमें क्षमता हो । इस मामले में वास्तव में प्रेस की आजादी का सवाल भी दांव पर लगा है ।