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child soldiers
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राष्ट्र संघ ने नेपाल के भूतपूर्व माओवादी विद्रोहियों से मांग की है कि वे उन
सभी बाल सैनिकों को रिहा कर दें, जिन्हें राजशाही को उखाड़ फेंकने के लिए एक दशक
तक चले आंदोलन के दौरान भर्ती किया गया था । ये भूतपूर्व विद्रोही अब नेपाल सरकार
को चला रहे हैं । नई दिल्ली से अंजना पसरीचा की रिपोर्ट-
राष्ट्र संघ का कहना है कि करीब 3,000 बाल सैनिक अभी भी राष्ट्र संघ की
निगरानी वाले नेपाल के शिविरों में रह रहे हैं । ये सभी माओवादी गुरिल्ला सेनाओं
से ताल्लुक रखते हैं ।
इन नाबालिग लोगों को माओवादियों ने नेपाल की राजशाही के खिलाफ छेड़े गए
गुरिल्ला संघर्ष के दौरान भर्ती किया था । 2006 में एक शांति समझौते के तहत 19,000
विद्रोही सैनिकों को अनेक शिविरों में बंद कर दिया गया था, जिनमें ये नाबालिग
सैनिक भी शामिल हैं ।
इसके बाद देश में काफी बदलाव आया है । माओवादी सत्ता में हैं और उनके नेता
प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री हैं । नेपाल में राष्ट्र संघ के मिशन के संचालक,
मैकेरीना आगुइलर ने कहा है कि सरकार को 18 साल से कम उम्र वाले सभी लड़ाकुओं को औपचारिक
रूप से रिहा कर देना चाहिए ।
उनका कहना है कि मुख्यधारा में फिर से शामिल होने के उनके अधिकार का सम्मान
किया जाना चाहिए और सभी को इसका समर्थन करना चाहिए । सभी लोगों को इस बात की चिंता
है कि जितना ये नाबालिग लोग अपने परिवारों और अपने समुदायों से अलग रहेंगे उतना ही
मुख्यधारा में शामिल होने की प्रक्रिया कठिन होती जाएगी ।
माओवादियों ने उनकी रिहाई की मांग पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है ।
उन्होंने कहा है कि अभी उन्हें यह फैसला करना है कि उनका क्या किया जाए । कुछ
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने चिंता प्रकट की है कि कहीं इन युवा लोगों को राजनीतिक
अभियानों में तो इस्तेमाल नहीं किया जाएगा ।
गौरी प्रधान राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के प्रवक्ता हैं । आयोग भी इन युवा
लड़ाकुओं की रिहाई पर जोर दे रहा है । गौरी प्रधान को आशा है कि हाल में हुए
राजनीतिक परिवर्तनों के बाद माओवादियों के सत्ता में आने के फलस्वरूप इन नाबालिग
लड़ाकुओं की किस्मत भी बदलेगी ।
उनका कहना है कि यह मौका ही नहीं है, आज की चुनौती भी है । प्रधानमंत्री पर
सरकार के मुखिया के होने के नाते इन नाबालिग लोगों को बचाने और वापस उन्हें अपने
परिवारों में भेजने की जिम्मेदारी है ।
यह मसला अभी हल किया जाना है कि शिविरों में रहने वाले हज़ारों गुरिल्ला
सैनिकों का क्या होगा । भूतपूर्व विद्रोही इन्हें सेना में भर्ती कराना चाहते हैं,
लेकिन सेना ऐसे सैनिकों को भर्ती करने के मामले में हिचक रही है, जिनकी राजनीतिक
रूप से दीक्षा हुई है ।